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 सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की फटकारों    से शर्मसार होती मध्यप्रदेश की सरकारें

चाहे मामा शिवराज का निजाम रहा हो या अब मोहन भैया का,सुप्रीमकोर्ट और सूबे के हाईकोर्ट द्वारा इनकी सरकारों को कठघरे में खड़ा किया जाता रहता है.सुप्रीमकोर्ट मध्यप्रदेश के सरकारी वकीलों के गैर जिम्मेदाराना रवैये और अक्सर गैरहाजरी पर प्रतिकूल टिप्पणी करती रही है.वकीलों की इस बहानेबाजी से नाराज होकर उसे राज्य सरकार से अपने वकीलों के पैनल की समीक्षा करने के निर्देश देने पड़े हैं.उधर प्रदेश का हाईकोर्ट भी मध्यप्रदेश के सरकारी वकीलों की अयोग्यता और निकम्मेपन पर सख्त टिप्पणियाँ करता रहा है.ओबीसी आरक्षण जैसे संवेदनशील मामले पर भी बहस के बजाए मध्यप्रदेश के सरकारी वकील बार बार वक्त मांगते देखे गए हैं.

रेत माफिया के लिए बदनाम चम्बल इलाके के मुरैना में इसी साल की शुरुआत मे जब रेत माफिया द्वारा फारेस्ट गार्ड की कुचल कर हत्या कर दी गई तब सुप्रीमकोर्ट ने पूछा मध्यप्रदेश में सरकार कहाँ है.? अब यहीं के बालाघाट में रेत माफिया ने पुलिस कांस्टेबल की हत्या की कोशिश की है.इसके बाद सुप्रीमकोर्ट ने मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान सरकार को भी हड़काया-नाक के नीचे खनन हो रहा और अफसरों को दिखता नहीं.! फिर उसने पूछा की हमारी फटकार के बाद ही क्यों जागा सिस्टम.?                               

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आपरेशन सिंदूर के बाद मीडिया को ब्रीफिंग करने वाली सेना की महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर मध्यप्रदेश के वरिष्ठ मंत्री विजय शाह की आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में अभियोजन में देरी के लिए सुप्रीमकोर्ट मध्यप्रदेश सरकार को फटकार लगा चुका है.इस मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़े शब्दों में कहा-बस,बहुत हुआ,अब हमारे आदेश का पालन कीजिए.तत्कालीन विधायक रामबाई के हत्या आरोपी पति की गिरफ्तारी में शिवराज सरकार की टालमटोल पर सुप्रीमकोर्ट मे सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड ने गिरफ़्तारी ना होने को जंगलराज बताया तो जस्टिस शाह ने कहा की प्रदेश सरकार संविधान के मुताबिक शासन करने के काबिल ही नहीं है.                                                                  

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सुप्रीम कोर्ट मुख्यमंत्री मोहन यादव की हुकूमत के बारे में ही  सवाल कर कर चुका है की-मध्यप्रदेश में कहाँ है सरकार.रेत माफिया के लिए बदनाम चम्बल इलाके के मुरैना में इसी साल की शुरुआत मे रेत माफिया द्वारा फारेस्ट गार्ड की कुचल कर हत्या कर दी गई तब ही सुप्रीमकोर्ट ने पूछ मध्यप्रदेश में सरकार कहाँ है.? यहीं के बालाघाट में रेत माफिया ने पुलिस कांस्टेबल की हत्या की कोशिश की है.इसके बाद सुप्रीमकोर्ट ने मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान सरकार को भी हड़काया-नाक के नीचे खनन हो रहा और अफसरों को दिखता नहीं.! फिर उसने यह भी पूछा की हमारी फटकार के बाद ही क्यों जागा सिस्टम.? मामा शिवराज के राज में चम्बल इलाके में ही  नौजवान आईपीएस अधिकारी की माफिया द्वारा ह्त्या कर दी गई जिसके बाद उनकी आईएएस पत्नी ने मध्यप्रदेश कैडर से बिदा ले ली.

एकदम ताजा मामला राजधानी भोपाल का है जहाँ अगस्त के दूसरे हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों पर सरकार को फटकार लगाने के बाद बनी कमेटी को उसकी अवमानना मानते हुए चेतावनी दी है.दरअसल उसके आदेश पर नीतिगत और प्रक्रियात्मक निर्णय लेने के लिए सरकार ने दो अगस्त को समिति का गठन का दिया.इस पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समिति को उसकी अवमानना मानते हुए न्याय के प्रशासन में दखल माना है. कोर्ट ने इस बात पर भी सख्त नाराजगी जताई की भोपाल नगर निगम ने पहले जिन सौ परिसरों को सील किया था बाद में उन्हीं अधिकारियों ने सीलिंग को हटा भी लिया.!


मध्यप्रदेश में शाही हुकूमतों की याद दिला रहीं मंत्रिमंडल की  भोपाल से बाहर बैठकें

राजधानियां होती ही इसलिए हैं जहाँ से सरकारें संचालित होती हैं.इसलिए विधानसभाएँ,मंत्रालय और मंतरी संतरी आदि वहीँ होते हैं और मंत्रिमंडल की बैठकें भी वहीँ होती हैं.यह इस गरीब मध्यप्रदेश की बदनसीबी है की यहाँ कभी दो राजधानियां हुआ करती थीं.!भोपाल के अलावा पचमढ़ी राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी.गर्मियों का मौसम आते ही राज्यपाल, मुख्यमंत्री,मंतरी/संतरी और फ़ौज फाटा सरकारी वाहनों में लद पचमढ़ी पहुंच जाता था.यहाँ राज्यपाल और मुख्यमंत्री के नामजद बंगलों के अलावा मंत्रियों के बंगले भी हुआ करते थे.विशाल राजभवन अब भी है,पर सेहत के चलते कई राज्यपाल तो वहां पहुँचे ही नहीं.वैसे तब भोपाल का मौसम भी गर्मियों में सुहावना होता था और जेठ की गर्मियां आसानी से झेली जा सकती थीं.

गर्मियों में राजधानी के पचमढ़ी शिफ्ट होने का सिलसिला साल-६८ में बंद हो गया जब यहाँ संविद की सरकार थी जिसमे तत्कालीन जनसंघ भी भागीदार था.अब भाजपा बन चुकी है और  राज्य में अरसे से सत्तारूढ़ पार्टी है.यहाँ कके पर्ची वाले मुख्यमंत्री मोहन यादव दीगर शहरों मे शाही अंदाज मे मंत्रिमंडल की बैठकें आयोजित कर रहे हैं जिन्हें शाही ठाठबाट के चलते मीडिया द्वारा दरबार कहा जाता है. इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट भाजपा द्वारा अतीत के राजघरानों को लुभाने पर केन्द्रित है.इसके मध्यप्रदेश ब्यूरो के राहुल नरोन्हा की अन्य संवाददाताओं के सहयोग से लिखी-राजघरानों की वापसी-शीर्षक रिपोर्ट का आगाज इंदौर मे मोहन यादव मंत्रिमंडल की शाही बैठक के ब्यौरे और बड़ी तस्वीर के साथ होता है.                                                                                                                                               ------------------------------------------------------------------------------------------------------

इंदौर के राजवाड़ा और दमोह के सिंग्रामपुर में मंत्रिमंडल की राजसी अंदाज की बैठकों के बाद हिल स्टेशन पचमढ़ी में बैठक हुई.सिंग्रामपुर बैठक वीरांगना दुर्गावती को समर्पित थी तो इंदौर के की बैठक अहिल्या बाई की स्मृति में थी.हिल स्टेशन पचमढ़ी की बैठक पर सैर सपाटे की तोहमत ना लग जाए सो इतिहास से सतपुड़ा के सपूत भभूतसिंह को निकाल बैठक उन्हे समर्पित कर दी गई.दाद देना पड़ेगी मुख्यमंत्री मोहन यादव के इस रुझान की.प्रदेश में 20--25 साल से भाजपा की सरकार है पर पहले कोई मुख्यमंत्री भभूत सिंह और उनके पराक्रम को सामने नहीं ला पाया था.!भभूतसिंह के महिमामंडन से किसे ऐतराज होगा पर उनकी याद इस बैठक के अवसर पर ही क्यों आई.?                   --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

 राजधानी से बाहर मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल की चौथी बैठक भोपाल के नजदीक जगदीशपुर में हुई जिसे पहले इस्लाम नगर कहा जाता था,खबरों के मुताबिक़ जगदीशपुर बैठक के लिए सड़कों,महलों और दीगर व्यस्वस्थाओं पर तेरह करोड़ खर्च कर डाले गए.मीडिया का कहना है की यहाँ की असली पहचान वास्तुकला का बेजोड़ नमूना गोंड महल अब भी खंडहर हालत में है.वीरांगना दुर्गावती,अहिल्याबाई और भभूतसिंह के जैसे जगदीशपुर का कोई नायक/नायिका नहीं खोजा जा सका तो यहाँ की बैठक समानता और न्याय को समर्पित रही.

मुख्यमंत्री का कोई भी इवेंट बिना विशाल विज्ञापनों के पूरा नहीं होता.तभी प्रदेश भर के अख़बारों में मोदी/मोहन की तस्वीरों वाला पूरा पेज विज्ञापन हर बैठक के अवसर पर छपता है.इसलिए इस बार भी पूरे पेज का विज्ञापन प्रदेशभर के मीडिया में मौजूद रहा. इस विज्ञापनबाजी और फ़ौज फाटे आदि के खर्च को जोड़ लें तो अब तक के चार तमाशे करोड़ों का जनधन लुटाने वाले साबित होंगे.दूरदराज के ऐसे तमाशे सरकारी अमले के लिए पिकनिक ज्यादा साबित होते हैं.