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निकम्मे सरकारी वकील मध्यप्रदेश की करा रहे फजीहत

सुप्रीम कोर्ट के बाद अब मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी वकीलों पर कड़ा प्रहार किया है.हाई कोर्ट की ग्वालियर पीठ ने गुरूवार को एक सरकारी प्रकरण की सुनवाई के दौरान यहाँ तक कह दिया है की राज्य सरकार ने अक्षम याने निकम्मे लोगों को सरकारी वकील बना रखा है.ये ना तो ठीक ढंग से बहस कर पाते हैं और ना मामलों के तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत ही कर पाते है.उसने प्रदेश के विधि सचिव को इस मामले में उपयुक्त कदम उठाने के निर्देश भी दिए हैं.देश की सबसे बड़ी अदालत याने सुप्रीम कोर्ट भी एकाध साल पहले मध्यप्रदेश के मामले पर सुनवाई के दौरान यहां के वकीलों पर तल्ख़ टिप्पणी कर चुका है.

चीफ जस्टिस रमन्ना की पीठ ने तब मध्यप्रदेश के वकीलों पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाईं थी.जस्टिस रमन्ना का कहना था की यह राज्य इतना ख़राब है की इसके वकील सुनवाई में कभी कोर्ट की मदद नहीं करते.वो कोर्ट में आते ही नहीं और आते हैं तो सुनवाई टालने का अनुरोध करने के लिए.उन्होने कहा चीफ सेक्रेटरी को तलब करना होगा तभी चीजें ठीक होंगी.पीठ ने तो तब यहां तक कह दिया था की मध्यप्रदेश के मामलों की सुनवाई वो तभी करेंगे जब एडवोकेट जनरल खुद जिरह करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सरकार के मुकदमों की पैरवी करने के लिए निजी वकीलों की सेवाएँ ली जाती हैं.इसके लिए कुछ वकीलों की नियुक्ति कर उनका पैनल बनाया जाता है.आमतौर पर सरकारी वकीलों की ऐसी नियुक्तियां सत्तारूढ़ पार्टी से अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष तरीके से जुड़े वकीलों को उपकृत करने के लिए की जाती हैं. जाहिर है इनमे काबिलियत और अनुभव मायने नहीं रखता है.इसलिए ज्यादातर मुकदमें सरकार हार भी जाती है.वैसे भी सरकार द्वारा दायर अधिकतर मुकदमें सत्तारूढ़ पार्टी के पूर्वाग्रह का परिणाम होते हैं जिनका न्यायिक पक्ष कमजोर ही होता है. (दैनिक भास्कर/नईदुनिया की खबरें)